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सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005

निर्देशिका

 

सूचना का अधिकार अधिनियम-2005 संसद ने पारित कर दिया है। अब यह कानून लागू भी कर दिया गया है। इस नए कानून के तहत भारत के हर नागरिक को एक बहुत महत्वपूर्ण अधिकार मिल गया है। इस कानून के बारे में पूरी जानकारी देने के लिए यह निर्देशिका तैयार की गई है ताकि लोगों को मालूम हो सके कि यह कानून उनकी किस तरह मदद करेगा और विभिन्न महकमे इसे किस तरह लागू करेंगे।

 

"कांग्रेस पार्टी के वादे के मुताबिक सूचना के अधिकार का ऐतिहासिक विधेयक 15 जून 2005 को पास हो चुका है। इससे पहले सूचना की स्वतंत्रता का एक कमज़ोर अधिनियम था। अब हमारे विचारों के अनुरूप सूचना के अधिकार का एक मजबूत अधिनियम है, जिसके माध्यम से ज्यादा से ज्यादा सच सामने आएगा। इससे प्रशासन के हर स्तर पर अधिक पारदर्शिता रहेगी और जिम्मेदारी भी तय होगी। अब गांवों, क़स्बों और शहरों के सभी नागरिकों को यह अधिकार है कि वे उन नीतियों, कार्यक्रमों और योजनाओं की सच्ची जानकारी मांगें, जिनका संबंध उनकी रोजमर्रा की ज़िंदगी से है। इस अधिनियम के लागू होने का एक बड़ा और ताजा फ़ायदा यह होगा कि अभी हाल में जो राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम पास हुआ है, उसकी सामाजिक निगरानी हो सकेगी। यह मालूम हो जाएगा कि वह ठीक से लागू हो रहा है कि नहीं। मिसाल के तौर पर अब कामों और काम करने वालों की सूची सबको सुलभ होगी। स्वयं-सेवी संगठन, समाज में सक्रिय दूसरी संस्थाएं और कार्य-दल इस अधिकार का उपयोग करके यह सुनिश्चित कर सकेंगे कि ग्रामीण विकास और समाज कल्याण की अनेक योजनाओं का लाभ उन ग़रीबों और कमज़ोर वर्गों को मिले, जिनके लिए वे बनी हैं।"

 

- सोनिया गांधी

 

लोकसभा में 10 मई 2005 को प्रधानमंत्री

डॉ. मनमोहन सिंह के संबोधन के अंश

 

आज की दुनिया में हम बेहद जटिल समाजों के साथ रह रहे हैं। इन समाजों को अपने रोजमर्रा के कामकाज में सरकारों की व्यापक भूमिका की जरूरत पड़ती है। हमारे खुद के देश में भी सरकार का कुल खर्च सकल घरेलू उत्पाद का 33 प्रतिशत है और यह केंद्र सरकार, राज्य सरकारों और स्वायत्त निकायों के जरिए किया जाता है। इसके अलावा अर्थव्यवस्था के सामान्य कामकाज में भी सरकारों को बहुत-सी परिस्थितियों की मजबूरियों की वजह से दखल देना पड़ता है और ऐसा अलग-अलग नियामक संस्थानों के माध्यम से किया जाता है।

 

जब सरकार देश के कुल खर्च के इतने बड़े हिस्से को खुद करती हो, जब वह आम देशवासियों की जिंदगी से जुड़ी बातों में इतना व्यापक दखल रखती हो, तब यह बेहद जरूरी हो जाता है कि सरकार अपने अधिकारों का इस्तेमाल बहुत ही सोच-समझ कर और लोक हित को ध्यान में रख कर ही करे।

 

दुनिया भर की सभ्य सरकारें भ्रष्टाचार की समस्या और सरकारों के कारगर होने में आड़े आने वाली खामियों से निबटने का हर स्तर पर प्रयास कर रही हैं। हमारे देश में भ्रष्टाचार को रोकने के लिए न्यायपालिका है और संसदीय प्रणाली से उपजी ऐसी कई प्रतिनिधि संस्थाएं हैं, जो यह ध्यान रखती हैं कि खर्च होने वाली रकम सचमुच सार्वजनिक हित के लिए ही खर्च हो। लेकिन इतना ही काफी नहीं है कि सरकार पांच बरस में एक बार जनता के दरबार में चली जाए।

 

जरूरी यह है कि नागरिकों को अधिकार संपन्न बनाने के ऐसे तरीके खोजे जाएं कि उन्हें अहसास हो कि राजकाज चलाने का मक़सद सार्वजनिक लक्ष्यों को पूरा करना है। सूचना पाने का अधिकार देना एक ऐसी व्यवस्था को स्थापित करना है, जिससे देशवासियों को यह जानने का और इसका आकलन करने का कानूनी हक मिलेगा कि उनकी सरकार सचमुच सबके हित के लिए काम कर रही है या नहीं? यह बताने की जरूरत नहीं है कि सब तरह की सूचनाओं का दुरुपयोग भी किया जा सकता है। इसलिए बहुत कुछ इस पर निर्भर करेगा कि सूचना मांगने वाले किस नीयत से सूचना मांग रहे हैं। मैं इसके अंतर्निहित खतरों को इसलिए अच्छी तरह समझता हूं कि सूचना हमारी व्यवस्था में असली ताकत है। लेकिन इस ताकत को ज्यादा-से-ज्यादा लोगों में बांटने का एक तरीका यह है कि सूचना पर कुछ ही लोगों का एकाधिकार रहने दिया जाए।

 

मेरे ख्याल से यह विधेयक सूचना हासिल करने का एक ऐसा इंतजाम करता है, जो आसान है, सहज है, समयबद्ध है और सस्ता है। इस विधेयक में व्यवस्था है कि सूचना देने में नाकाम रहने वालों या सूचना मुहैया कराने में कोई भी अड़ंगा डालने वालों को कड़ी सजा मिले। दरअसल, इस विधेयक में ऐसा इंतजाम किया गया है कि विभिन्न एजेंसियां लोगों को अपने आप ही सूचनाएं मुहैया कराएं ताकि कोई सूचना प्राप्त करने में ज्यादा लागत आए।

 

हम सभी जानते हैं कि विकास की प्रक्रिया में कई कड़ियां आपस में जुड़ी होती हैं। हम सब यह भी जानते हैं कि सबसे ग़रीब तबके को मिलने वाला लाभ उन तक नहीं पहुंचता है। हमें यह भी मालूम है कि ग़रीब और कमज+ोरों के लिए खर्च किए जाने वाले धन को दरअसल किस तरह समाज का प्रभावी तबका खा जाता है। मुझे उम्मीद है कि सूचना पाने का अधिकार सार्वजनिक धन के दुरुपयोग को रोकने के लिए उन लोगों के हाथ में एक कारगर हथियार देगा, जो लोक हित को सबसे ज्यादा अहमियत देते हैं। इसलिए मुझे लगता है कि यह एक ऐतिहासिक विधेयक है। यह विधेयक पारित हुआ तो मुल्क के लोकतंत्र की नींव और मज+बूत होगी। यह विधेयक पारित हुआ तो पारदर्शी और मानवीय प्रशासन की राह और प्रशस्त होगी। यह विधेयक पारित हुआ तो हमारा प्रशासन हमेशा से ज्यादा जवाबदेह बनेगा।

 

इस विधेयक के पारित होने से राजकाज के तरीके में एक नया युग शुरू होगा। अपना काम अच्छी तरह पूरा करने की ललक का युग। अपना काम फुर्ती से करने का युग। तरक्की के फ़ायदों को समाज के सभी तबकों तक समान रूप से पहुंचाने का युग। भ्रष्टाचार के महासंकट को उखाड़ फेंकने का युग। आम आदमी की चिंताओं को प्रशसन-प्रक्रिया के सभी दिलों तक पहुंचाने का युग। एक ऐसा युग, जो हमारे गणराज्य के पितृ-पुरुषों की उम्मीदों को सच्चे अर्थों में पूरा करेगा।

 

सूचना मांगने वालों के कंधों पर भी महती जि+म्मेदारी आने वाली है और उन पर भी, जिन्हें सूचना देने का काम करना है। मुझे पूरा भरोसा है कि हमारे देश में ऐसे लोगों की कमी नहीं है, जो सही संतुलन बनाए रखना जानते हैं। हमें एक सशक्त और सार्थक सरकार की ज+रूरत है। हमें ऐसी शासन-प्रक्रिया की ज+रूरत है, जो अपने समय की चुनौतियों पर खरी उतरे और जो हमें इतना समर्थ बनाए कि हम अपने तय मकसदों को हासिल करने की दिशा में तेजी से बढ़ सकें। साथ-ही-साथ मैं यह भी मानता हूं कि इस देश का उज्जवल भविष्य लोकतंत्र की नींव को मजबूत करने पर ही निर्भर है। यह विधेयक पारदर्शिता की संस्कृति को विकसित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जवाबदेही की संस्कृति विकसित करने की एक अहम छलांग है और यह सुनिश्चित करने की दिशा में एक बड़ा कदम है कि सरकार सिर्फ लोक हित के लिए ही काम करे। भारत गणराज्य की संस्थापक विभूतियों का भी यही सपना था।

 

सूचना के अधिकार के बारे में आमतौर पर

पूछे जाने वाले सवाल और उनके जवाब

 

प्रश्न : सूचना का अधिकार देने वाला कानून कब लागू होगा?

 

उत्तर : यह कानून 12 अक्टूबर 2005 से लागू हो जाएगा। इस कानून के कुछ प्रावधान फौरन लागू हो गए हैं। अधिकारियों के दायित्व, लोक सूचना अधिकारियों और सहायक लोक सूचना अधिकारियों के पदनाम, केंद्रीय सूचना आयोग के गठन, राज्य सूचना आयोगों के गठन गुप्तचर और सुरक्षा संगठनों पर अधिनियम लागू नहीं होने और इस अधिनियम को लागू करने के लिए नियमों को बनाए जाने का अधिकार देने वाली धाराएं तुरंत प्रभाव से लागू हो चुकी हैं।

 

प्रश्न : इस कानून के दायरे में कौन-कौन आता है?

 

उत्तर : इस कानून के दायरे में जम्मू-कश्मीर राज्य को छोड़ कर पूरा भारत है।

 

प्रश्न : सूचना की परिभाषा क्या है?

 

उत्तर : सूचना का मतलब है किसी भी रूप में रखी गई ऐसी कोई भी सामग्री, जिसकी किसी भी सरकारी अधिकारी को कानूनन जानकारी है। इनमें रिकॉर्ड, दस्तावेज, ज्ञापन, ई-मेल, अभिमत, सलाह, प्रेस विज्ञप्तियां, परिपत्र, आदेश, लॉग बुक, अनुबंध, रिपोर्ट, काग़ज-पत्र, नमूने, मॉडल और किसी भी इलेक्ट्रॉनिक शक्ल में रखा गया डाटा शामिल है। सूचना की परिभाषा में निजी संस्थानों से संबंधित ऐसी सभी जानकारियां भी शामिल हैं, जिन्हें मौजूदा कानूनों के आधार पर कोई भी सरकारी अधिकारी हासिल कर सकता हो, लेकिन सूचना की परिभाषा में फाइलों पर लिखी जाने वाली टिप्पणियां शामिल नहीं हैं।

 

प्रश्न : सूचना के अधिकार का मतलब क्या है?

 

उत्तर : इस कानून में आम लोगों को निम्नलिखित अधिकार प्राप्त हैं-

 

       कार्यों, दस्तावेज़ों और रिकॉर्ड का निरीक्षण करना

       दस्तावेज़ और अभिलेखों के नोट्स लेना, उनके अंशों की या पूरे दस्तावेज़ की फोटो कॉपी प्राप्त करना

       साम्रगी के प्रमाणित नमूने लेना

       प्रिंट आउट, डिस्ट, फ्लापी, टेप, वीडियो कैसेट या अन्य किसी भी इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से सूचना प्राप्त करना

 

अधिकारियों के दायित्व

 

प्रश्न : लोक सेवक की परिभाषा में आने वाले अधिकारियों के दायित्व क्या होंगे?

 

उत्तर : लोक सेवक के दायरे में आने वाला अधिकारी 12 अक्टूबर 2005 तक निम्नलिखित बातों की सार्वजनिक घोषणा करेगा -

 

       अपने संगठन/संस्था/कार्यालय का ब्यौरा, उसके कार्य और कर्तव्य

       उसके अधिकारियों और कर्मचारियों के अधिकार और जिम्मेदारियां

       फैसले लेने की प्रक्रिया और पर्यवेक्षण तथा जवाबदेही

       कार्य का निर्वहन करने के लिए बनाए गए मानदंड

       कार्यों को पूरा करने के लिए कर्मचारियों द्वारा प्रयोग किए जाने वाले नियम, विनियम, निर्देश, मैनुअल और रिकॉर्ड

       उसके अधीन रखे हुए दस्तावेज की वर्गीकरण

       ऐसी किसी भी व्यवस्था की मौजूदगी का पूरा ब्यौरा, जो नीतियां, बनाने और उन्हें लागू करने के लिए जनता के प्रतिनिधियों की राय लेने के बारे में हो या समाज के सदस्यों को प्रतिनिधित्व देने के बारे में हो

       संगठन/संस्था/कार्यालय द्वारा गठित ऐसे बोर्ड, परिषदों, समितियों और अन्य निकायों के विवरण की घोषणा, जिसमें दो या उससे ज्यादा व्यक्ति हैं। साथ ही यह सूचना कि इनकी बैठकें जनता के लिए खुली हुई हैं या नहंीं और इनकी बैठकों में हुई कार्यवाही का ब्यौरा जनता को दिया जा सकता है या नहीं

       अधिकारियों और कर्मचारियों के नाम-पते और फोन नंबर की निर्देशिका

       अधिकारियों और कर्मचारियों में से हर एक को मिलने वाला मासिक वेतन और नियमों के मुताबिक मिलने वाली प्रतिपूर्ति रकम की प्रणाली

       सभी योजनाओं पर होने वाला प्रस्तावित खर्च, योजनाओं के लिए दिया जा चुका धन और काम करने के लिए विभिन्न एजेंसियों को आवंटित बजट

       सब्सिडी योजनाओं को पूरा करने की प्रणाली, उनके लिए खर्च की जाने वाली रकम और इन कार्यक्रमों का लाभ लेने वालों का ब्यौरा

       रियायतें, परमिट और अधिकार पत्र पाने वाले व्यक्तियों का ब्यौरा

       इलेक्ट्रॉनिक रूप में रखी गई सूचना के संबंध में ब्यौरा

       सूचना हासिल करने के लिए नागरिकों को उपलब्ध सुविधाओं की जानकारी और सार्वजनिक उपयोग के लिए बनाए गए किसी पुस्तकालय या वाचनालय के कामकाज के घंटों की जानकारी

       लोक सूचना अधिकारियों के नाम, पदनाम और अन्य ब्यौरा

 

प्रश्न : लोक प्राधिकारी से तात्पर्य क्या है?

 

उत्तर : संविधान के प्रावधानों के जरिए, संसद द्वारा बनाए गए कानूनों के जरिए और राज्यों की विधानसभाओं द्वारा बनाए गए किसी कानून के माध्यम से गठित किसी भी प्राधिकरण, निकाय या स्वायत्त शासन की संस्था को लोक प्राधिकारी माना गया है। सरकारों के स्वामित्व वाली और सरकार की वित्तीय मदद से चलने वाली संस्थाएं भी इसी दायरे में आती है। ऐसे गैर सरकारी संगठन भी लोक प्राधिकारी माने जाएंगे, जो सरकार की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष वित्तीय मदद से अपना काम करते हैं।

 

प्रश्न : लोक सूचना अधिकारी कौन होंगे?

 

उत्तर : नागरिकों को सूचना देने के लिए सरकारी संगठनों द्वारा नामजद किए जाने वाले अधिकारी को लोक सूचना अधिकारी कहा जाएगा। महकमे के सभी अधिकारियों और कर्मचारियों को सूचना उपलब्ध कराने के काम में लोक सूचना अधिकारी की पूरी मदद करनी होगी ताकि वह नागरिकों द्वारा मांगी गई सूचना उन्हें दे सके।

 

प्रश्न : लोक सूचना अधिकारी के कर्तव्य क्या होंगे?

 

उत्तर : लोक सूचना अधिकारी के कर्तव्य निम्नलिखित हैं -

 

       सूचना मांगने वाले व्यक्ति से मिले अनुरोध पर लोक सूचना अधिकारी कार्रवाई करेगा।

       लिखित अनुरोध करने में नागरिकों को उचित सहायता करेगा।

       अगर मांगी गई सूचना किसी और महकमे से संबंध रखती है तो लोक सूचना अधिकारी की जिम्मेदारी होगी कि वह पांच दिनों के भीतर आवेदन दूसरे मकहमे को भेज दे और आवेदक को इसकी फौरन जानकारी दे कि उसका आवेदन दूसरे मकहमे या संगठन को भेज दिया गया है।

       लोक सूचना अधिकारी को यह अधिकार होगा कि वह अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह करने के लिए किसी भी दूसरे अधिकारी की मदद ले।

       सूचना पाने के लिए फीस सहित आवेदन मिलने के तीस दिनों के भीतर लोक सूचना अधिकारी को या तो आवेदक को सूचना उपलब्ध करानी होगी या कारण बताते हुए अनुरोध अस्वीकार करना होगा।

       अगर किसी नागरिक द्वारा मांगी गई सूचना का संबंध उसके जीवन की सुरक्षा या व्यक्तिगत स्वतंत्रता से है तो लोक सूचना अधिकारी को ऐसी सूचना आवेदन मिलने के 48 घंटों के भीतर उपलब्ध करानी होगी।

       अगर नियमों के मुताबिक तय समय सीमा के भीतर सूचना उपलब्ध नहीं कराई जाती है तो अपने आप यह मान लिया जाएगा कि लोक सूचना अधिकारी ने आवेदक का अनुरोध नामंजूर कर दिया है।

       अनुरोध अस्वीकार कर देने की स्थिति में लोक सूचना अधिकारी को आवेदक को यह बताना होगा कि नामंजूरी की वजह क्या है, नामंजूरी के खिलाफ नागरिक कितने दिनों के भीतर अपील कर सकता है और अपील कहां की जाए?

       नागरिकों को सूचना आमतौर पर उसी प्रारूप में उपलब्ध करानी होगी, जिस प्रारूप में सूचना मांगी गई है। लेकिन अगर संसाधन होने की वजह से या किसी रिकॉर्ड की सुरक्षा या रखरखाव संबंधी कारणों से चाहे गए प्रारूप में सूचना उपलब्ध कराई जा सकती हो तो लोक सूचना अधिकारी आवेदन को दूसरे प्रारूप में सूचना मुहैया करा सकता है।

       अगर मांगी गई सूचना का कोई हिस्सा आवेदक को उपलब्ध नहीं कराया जा सकता है तो लोक सूचना अधिकारी आवेदक को यह नोटिस देगा कि उसे रिकॉर्ड के उस हिस्से के आधार पर ही सूचना मुहैया कराई जा रही है, जिसे सार्वजनिक किया जा सकता है। वह आवेदक को यह भी बताएगा कि किसी दस्तावेज़ या रिकॉर्ड के बाकी हिस्से को सार्वजनिक किए जा सकने का फैसला लेने वाले अधिकारी का नाम और पद क्या है। आवेदक को यह जानकारी भी दी जाएगी कि पूरी सूचना नहीं किए जाने की वजह से क्या उसे फीस का कोई अंश वापस दिया जाएगा और रिकॉर्ड को पूरी तरह सार्वजनिक नहीं करने के फैसले की समीक्षा कराने संबंधी उसके अधिकार क्या है?

       अगर आवेदक द्वारा मांगी गई सूचना किसी तीसरे पक्ष को उपलब्ध करानी है और वह दावा करता है कि सूचना गोपनीय है तो लोक सूचना अधिकारी पांच दिनों के भीतर तीसरे पक्ष को नोटिस देगा और उसे नोटिस मिलने के दस दिनों के भीतर अपनी बात रखने का अवसर देगा।

 

सूचना की उपलब्धता

 

प्रश्न : किन सूचनाओं को उपलब्ध नहीं कराया जा सकता?

 

उत्तर : निम्नलिखित मामलों में सूचना उपलब्ध नहीं कराने की छूट है -

 

       जिस सूचना को सार्वजनिक करने से भारत की प्रभुता, अखंडता, सुरक्षा, रणनीति संबंधी वैज्ञानिक हितों या आर्थिक हितों और विदेशों से संबंधों पर प्रतिकूल असर पड़ता हो या किसी अपराध को करने का उकसावा मिलता हो

       जिस सूचना को जाहिर करने पर अदालत ने रोक लगा रखी हो या जिसे सार्वजनिक करने से अदालत की अवमानना होती हो

       जिस सूचना को उपलब्ध कराने से संसद या किसी राज्य की विधानसभा और विधान परिषद के विशेषाधिकार भंग होते हों

       जिस सूचना से कारोबारी विश्वास, व्यापार की गोपनीयता और बौद्धिक संपदा संबंधी मामलों पर उलटा असर पड़ता हो, लेकिन अगर लोक सूचना अधिकारी को यह भरोसा हो जाता है कि ऐसी सूचना मुहैया कराना लोक हित में जरूरी है तो वह सूचना दे सकता है

       किसी भी विदेशी सरकार से आपसी विश्वास के नाते प्राप्त हुई सूचना

       जिस सूचना को जाहिर करने से किसी व्यक्ति की ज़िंदगी खतरे में पड़ती हो या उसकी शारीरिक सुरक्षा के लिए खतरा पैदा हो जाता हो या सूचना के स्रोत की पहचान की वजह से और विश्वास में दी गई सहायता के मामले में कोई खतरा पैदा होता हो या किसी भी तरह के सुरक्षा इंतजामों को खतरा पैदा हो सकता हो

       जिस सूचना को सार्वजनिक करने से अपराधों की जांच-पड़ताल और अपराधियों को गिरफ्तार करने में अड़चन पड़े

       मंत्रिमंडल के ऐसे कागज-पत्र, जिन पर मंत्रियों, सचिवों और अन्य अधिकारियों के विचार-विमर्श की टिप्पणियों का रिकॉर्ड शामिल है

       जिस सूचना को सार्वजनिक करना तो लोक हित के लिए जरूरी है और जिससे कोई सार्वजनिक मकसद पूरा होता हो और जिससे किसी व्यक्ति के निजी जीवन और एकांत के अधिकार पर प्रतिकूल असर पड़ता हो

       ऐसी कोई भी सूचना, जिसका सार्वजनिक किया जाना भले लोक हित में हो, मगर जिसे जाहिर करने से संरक्षित हितों को नुकसान ज्यादा होता हो

 

प्रश्न : क्या सूचना को आंशिक तौर पर सार्वजनिक करने की इजाजत है?

 

उत्तर : किसी रिकॉर्ड के ऐसे हिस्से को, जिसकी सूचना सार्वजनिक नहीं की जा सकती, उस रिकॉर्ड के बाकी हिस्से से अलग किया जा सकता है और जो हिस्सा सार्वजनिक किया जा सकता है, उसके बारे में आवेदक को सूचना उपलब्ध कराई जा सकती है।

 

प्रश्न : सूचना अधिकार कानून किन-किन पर लागू नहीं है?

 

उत्तर : संविधान की दूसरी अनुसूची में शामिल गुप्तचर और सुरक्षा संगठन कोई सूचना देने के लिए बाध्य नहीं है। गुप्तचर ब्यूरो, रॉ, राजस्व गुप्तचर निदेशालय, केंद्रीय आर्थिक गुप्तचर ब्यूरो, नारकोटिक्स नियंत्रण ब्यूरो, प्रवर्तन निदेशालय, विमानन अनुसंधान केंद्र, विशेष सीमांत बल, सीमा सुरक्षा बल, केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल, भारत-तिब्बत सीमा पुलिस, केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल, राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड, असम रायफल्स, स्पेशल सर्विस ब्यूरो, अंडमान-निकोबार, लक्षद्वीप और दादरा-नगर हवेली पुलिस की विशेष सी.आई.डी. शाखाएं तथा राज्य सरकारों द्वारा अधिसूचना जारी कर घोषित किए जाने वाले अन्य कोई भी विभाग। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि इन सभी विभागों को सूचना नहीं देने की संपूर्ण छूट दे दी गई है। इन सभी विभागों और संगठनों की जि+म्मेदारी है कि वे भ्रष्टाचार तथा मानव अधिकारों के उल्लंघन के आरोपों के संबंध में जानकारी प्रदान करें। मानव अधिकार उल्लंघन संबंधी मामलों में जानकारी केंद्र या राज्य सूचना आयोगों की इजाजत मिलने के बाद ही दी जा सकती है।

 

सूचना पाने का अनुरोध करने की प्रक्रिया

 

प्रश्न : सूचना मांगने का आवेदन करने की प्रक्रिया क्या है?

 

उत्तर : हिंदी, अंग्रेजी या संबंधित क्षेत्र की राजभाषा में लोक सूचना अधिकारी (पीआईओ) को लिखित आवेदन दें या इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से आवेदन उन्हें भेजें। मांगी गई सूचना का कारण बताना जरूरी नहीं है। आवेदन के साथ निर्धारित शुल्क जमा कराना होता है। ग़रीबी रेखा के नीचे की श्रेणी में आने वालों के लिए आवेदन निशुल्क है।

 

प्रश्न : सूचना कितने दिनों में मिल जाती है?

 

उत्तर : आवेदन करने की तारीख से तीस दिनों के भीतर सूचना उपलब्ध करा दी जाती है। किसी व्यक्ति की ज़िंदगी की सुरक्षा या स्वतंत्रता से संबंधित सूचना 48 घंटों के भीतर उपलब्ध करानी होती है। अगर आवेदन सहायक सूचना अधिकारी के पास भेजा गया है तो सूचना 35 दिनों में मिलती है। अगर सूचना देने से किसी तीसरे पक्ष के हित प्रभावित होते हों तो सूचना 40 दिनों में उपलब्ध कराई जाती है। तयशुदा समय सीमा में सूचना नहीं मिलती है तो माना जाएगा कि सूचना देने से इनकार कर दिया गया है।

 

प्रश्न : आवेदन के साथ कितनी फीस जमा करनी होती है?

 

उत्तर : सूचना के हिसाब से शुल्क तय किया जाएगा और वह उचित लगने वाला आंकड़ा होगा। अगर आंकड़े वगैरह इकट्ठे करने की जरूरत है और उसके लिए अतिरिक्त शुल्क लेना हो तो आवेदक को इसकी लिखित जानकारी दी जाती है। आवेदक को अधिकार है कि शुल्क के बारे में अपील कर सके। ग़रीबी की जीवन रेखा के नीचे रहने वालों से कोई शुल्क नहीं लिया जाता है। अगर सूचना समय सीमा में उपलब्ध नहीं कराई जाती है तो आवेदक को बाद में सूचना बिना किसी शुल्क के दी जाती है।

 

प्रश्न : सूचना देने से मना करने के क्या कारण हो सकते हैं?

 

उत्तर : अगर सूचना अधिकार कानून की धारा 8 के दायरे में संबंधित सूचना देने से छूट मिली हुई हो या धारा के अनुसार कोई सूचना किसी किसी व्यक्ति के कॉपीराइट को प्रभावित करती हो तो ऐसी सूचना सार्वजनिक करने से इनकार किया जा सकता है।

 

सूचना आयोग का गठन

 

प्रश्न : केंद्रीय सूचना आयोग कैसे गठित किया जाता है?

 

उत्तर : भारत सरकार के राजपत्र में केंद्र सरकार की तरफ से अधिसूचना जारी कर केंद्रीय सूचना आयोग का गठन होता है। आयोग में एक मुख्य सूचना आयुक्त और अधिकतम 10 सूचना आयुक्त होते हैं। इन सभी की नियुक्ति राष्ट्रपति करेंगे। सभी आयुक्तों को राष्ट्रपति द्वारा शपथ ग्रहण कराई जाएगी। आयोग का मुख्यालय दिल्ली में होगा। केंद्र सरकार की मंजूरी से देश के अन्य हिस्सों में भी आयोग के कार्यालय खोले जा सकते हैं। आयोग अपने अधिकारों का इस्तेमाल करने में किसी से निर्देश नहीं लेगा।

 

प्रश्न : मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्तों की नियुक्ति की पात्रता क्या होगी? उनकी नियुक्ति की प्रक्रिया क्या होगी?

 

उत्तर : विधि एवं कानून, विज्ञान एवं तकनीकी, समाज सेवा, प्रबंधन, जनसंपर्क, पत्रकारिता, शासन और प्रशासन में पर्याप्त ज्ञान और अनुभव रखने वाले व्यक्ति को इन पदों पर नियुक्त किया जा सकेगा। संसद, विधानसभाओं और विधान परिषदों के सदस्य इन पदों पर नियुक्त नहीं किए जा सकेंगे। इन पदों पर नियुक्त व्यक्ति लाभ के किसी अन्य पद पर नहीं रहेगा, कोई व्यवसाय नहीं करेगा और किसी राजनीतिक दल से जुड़ा नहीं रहेगा। आयुक्तों को नियुक्त करने की समिति के अध्यक्ष प्रधानमंत्री होंगे। समिति के बाकी सदस्यों में लोकसभा में प्रतिपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री द्वारा नामजद केंद्रीय मंत्रिमंडल के एक मंत्री रहेंगे।

 

प्रश्न : मुख्य सूचना आयुक्त का कार्यकाल और सेवा शर्तें क्या होंगी?

 

उत्तर : मुख्य सूचना आयुक्त को अपना पद संभालने की तारीख से पांच वर्ष तक के लिए नियुक्त किया जाएगा। वे अधिकतम ६5 वर्ष की उम्र तक अपने पद पर रह सकेंगे। एक व्यक्ति को दोबारा इस पद पर नियुक्त नहीं किया जा सकेगा। वेतन मुख्य निर्वाचन आयुक्त को मिलने वाले वेतन के समान होगा।

 

प्रश्न : सूचना आयुक्तों का कार्यकाल कितना रहेगा और उनके लिए क्या सेवा शर्तें होंगी?

 

उत्तर : सूचना आयुक्तों का कार्यकाल भी पद संभालने की तारीख से पांच वर्ष का होगा। वे भी अधिकतम ६5 वर्ष की उम्र तक अपने पद पर रह सकेंगे। सूचना आयुक्तों के पदों पर भी एक ही व्यक्ति की दोबारा नियुक्ति नहीं की जा सकेगी। किसी सूचना आयुक्त को मुख्य सूचना आयुक्त के पद पर नियुक्त किया जा सकेगा, लेकिन दोनों पदों पर कुल मिला कर वह पांच वर्ष की अवधि से ज्यादा समय काम नहीं कर सकेगा। सूचना आयुक्तों का वेतन निर्वाचन आयुक्तों को मिलने वाले वेतन के बराबर होगा।

 

प्रश्न : राज्य सूचना आयोग कैसे गठित किए जाएंगे?

 

उत्तर : राज्य सरकारें अपने राजपत्रों में सूचना आयोगों के गठन की अधिसूचनाएं प्रकाशित करेंगी। राज्य सूचना आयोग में एक राज्य मुख्य सूचना आयुक्त होगा और अधिकतम 10 राज्य सूचना आयुक्त। इनकी नियुक्ति राज्यपाल करेंगे। राज्यपाल उन सभी को शपथ ग्रहण कराएंगे। राज्य सरकार तय करेगी कि आयोग का मुख्यालय कहां होगा। राज्य के विभिन्न हिस्सों में आयोग के कार्यालय खोलने के बारे में भी वही फैसला करेगी। राज्य आयोग भी किसी भी मकहमे से निर्देश लिए बिना अपना काम करेंगे।

 

प्रश्न : राज्य मुख्य सूचना आयुक्त और राज्य सूचना आयुक्तों की नियुक्ति के लिए क्या पात्रता होगी और उनकी नियुक्ति के लिए क्या प्रक्रिया अपनाई जाएगी?

 

उत्तर : नियुक्ति समिति के अध्यक्ष मुख्यमंत्री होंगे। बाकी सदस्यों में विधानसभा में विपक्ष के नेता और मुख्यमंत्री द्वारा नामजद एक कैबिनेट मंत्री शामिल रहेंगे। राज्य आयोग में मुख्य आयुक्त और आयुक्तों की नियुक्ति के लिए पात्रता केंद्रीय आयोग में नियुक्ति की पात्रता जैसी ही रहेगी। राज्य मुख्य सूचना आयुक्त का वेतन केंद्रीय निर्वाचन आयोग के आयुक्त के वेतन के बराबर रहेगा और राज्य सूचना आयुक्तों का वेतन राज्य सरकार के मुख्य सचिव को मिलने वाले वेतन के समान होगा।

 

प्रश्न : सूचना आयोगों के अधिकार और कार्य क्या होंगे?

 

उत्तर : केंद्रीय सूचना आयोग और राज्य सूचना आयोगों का कर्तव्य है कि वे ऐसे व्यक्तियों से शिकायतें प्राप्त करें -

 

       जो इसलिए सूचना पाने का आवेदन नहीं दे सका कि लोक सूचना अधिकारी ही नियुक्त नहीं हुआ था

       जिसे सूचना उपलब्ध कराने से इनकार कर दिया गया हो

       जिसे तयशुदा समय सीमा के भीतर अपनी सूचना के बारे में कोई जवाब नहीं मिला हो

       जिससे आवेदन के साथ फीस के तौर पर ऐसी रकम मांगी गई हो, जिसे वह ठीक नहीं मानता

       जिसे लगता है कि उसे दी गई सूचना अधूरी है, भ्रामक है या सही नहीं है

       जिसे इस कानून के तहत सूचना प्राप्त करने संबंधी कोई भी और शिकायत है आयोगों को अधिकार होगा कि अगर उन्हें लगता है कि शिकायत उचित है तो वह उस पर जांच के आदेश दे। केंद्रीय मुख्य सूचना आयुक्त और राज्य के मुख्य सूचना आयुक्त को सिविल न्यायालय की तरह ही निम्नलिखित न्यायालयीन अधिकार होंगे-

       किसी को समन करना, अपने सामने उपस्थित होने के लिए कहना, शपथ ले कर मौखिक गवाही देने को कहना, शपथ ले कर लिखित सबूत पेश करने को कहना और उन्हें दस्तावेज़ पेश करने को बाध्य करना

       दस्तावेज़ का निरीक्षण करना

       शपथ पत्र पर साक्ष्य लेना

       किसी न्यायालय या कार्यालय से कोई भी सार्वजनिक रिकॉर्ड या उसकी प्रतिलिपियां मांगना

       गवाहों से पूछताछ या दस्तावेज़ के परीक्षण के लिए समन जारी करना

       इससे संबंधित अन्य कोई भी विषय यह जरूरी होगा कि कानून के दायरे में आने वाले सभी दस्तावेज़ केंद्रीय सूचना आयुक्त और राज्यों के मुख्य सूचना आयुक्तों को उपलब्ध कराए जाएं और उन्हें ऐसा रिकॉर्ड भी उपलब्ध कराना होगा, जिसे सार्वजनिक करने से छूट मिली हुई हो। आयोगों को अपने फैसलों का पालन कराने के लिए निम्नलिखित शक्तियां दी गई हैं -

       सूचना तक नागरिकों की पहुंच आसान कराना ताकि विशिष्ट प्रारूप में उसे सूचना मिल सके

       अगर लोक सूचना अधिकारी और सहायक लोक सूचना अधिकारियों की नियुक्ति कहीं हुई हो तो संबंधित महकमें को ये नियुक्तियां करने के निर्देश देना

       सूचना और उसके वर्ग को प्रकाशित करना

       रिकॉर्ड रखे जाने के तरीके, उनके प्रबंधन के तरीके और रिकॉर्ड नष्ट किए जाने से संबंधित पद्धतियों में परिवर्तन करना

       सूचना के अधिकार के बारे में अधिकारियों के प्रशिक्षण के दायरे को बढ़ाना

       सूचना अधिकार कानून के पालन के बारे में विभिन्न महकमों से वार्षिक रिपोर्ट मांगना

       शिकायत करने वाले को हुए किसी भी नुकसान की भरपाई करवाना

       इस कानून के तहत जुर्माना करना

       आवेदन को नामंजूर करना

 

प्रश्न : कानून पर अमल की रिपोर्ट कैसे बनेगी?

 

उत्तर : हर वर्ष के अंत में केंद्रीय सूचना आयोग इस कानून के प्रावधानों को लागू करने के बारे में केंद्र सरकार को एक रिपोर्ट भेजेगा। राज्य सूचना आयोग राज्य सरकार को रिपोर्ट भेजेगा। हर मंत्रालय की यह जिम्मेदारी होगी कि वह अपने मातहत आने वाले विभिन्न संगठनों और विभागों से आई रिपोर्ट को संकलित कर उसे केंद्रीय सूचना आयोग/राज्य सूचना आयोग को भेजे। हर रिपोर्ट में प्राप्त हुए आवेदनों की संख्या, नामंजूर कर दिए गए आवेदनों की संख्या, अपीलों की संख्या, की गई अनुशासिक कार्रवाइयों का विवरण, फीस और प्रभार के तौर पर वसूली गई धन राशि का ब्यौरा, वगैरह देना होगा। केंद्र सरकार केंद्रीय सूचना आयोग की वार्षिक रिपोर्ट को संसद में पेश करेगी। राज्य सरकार राज्य सूचना आयोग की वार्षिक रिपोर्ट विधानसभा में पेश करेगी।

 

सरकारों की भूमिका

 

प्रश्न : सूचना अधिकार कानून के मामले में केंद्र और राज्य सरकारों की क्या भूमिका रहेगी?

 

उत्तर : सरकारें इस कानून के बारे में जागरूकता पैदा करने का काम करेंगी। ऐसे शैक्षिक कार्यक्रम बनाएंगी कि लोगों को इस कानून के जरिए मिले अपने हक की व्यापक जानकारी मिले। सरकार के विभिन्न महकमों और संगठनों को ऐसे कार्यक्रमों में हिस्सेदारी के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा, जिनसे लोग जागरूक हों। सही जानकारी समय पर जनता तक पहुंचाने के लिए प्रचार-प्रसार किया जाएगा। सरकारें अपने अधिकारियों को प्रशिक्षित करने का काम करेंगी और उन्हें प्रशिक्षण सामग्री देंगी। राज्य सरकारें अपनी-अपनी राजभाषा में इस कानून के बारे में निर्देशिका प्रकाशित कर उनका व्यापक वितरण करेंगी। वे लोक सूचना अधिकारियों के नाम, पद, पते और उनसे संपर्क करने के बाकी विवरण प्रकाशित करेंगी। सरकारें फीस के बारे में और इस कानून में लोगों को दिए गए अधिकारों के बारे में तफसील से ब्यौरा प्रकाशित-प्रसारित करेंगी।

 

प्रश्न : इस कानून का पालन करने के लिए नियम बनाने का अधिकार किसे है?

 

उत्तर : केंद्र सरकार और राज्य सरकारें इस कानून के प्रावधानों को लागू करने के लिए नियम बना सकेंगी। इस कानून की धारा 2 (ई) में बताया गया है कि और किन्हें नियम बनाने का अधिकार होगा।

 

प्रश्न : अगर इस कानून को लागू करने में कोई दिक्कत आई तो उससे कैसे निबटा जाएगा?

 

उत्तर : कानून की धारा 30 के मुताबिक केंद्र सरकार को अधिकार होगा कि अगर इस कानून के किसी प्रावधान को लागू करने में कोई कठिनाई आती है तो वह राजपत्र में एक आदेश प्रकाशित करके उस कठिनाई को दूर करने के लिए जरूरी प्रावधान बना ले।


 
 

 

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