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कांग्रेस ने

आदिवासी तथा परंपरागत वन निवासियों

को वन भूमि का अधिकार दिया

 

आदिवासियों तथा परंपरागत वन निवासियों

के लिये वन भूमि के पट्टे

 

शुरू से ही कांग्रेस की आदिवासियों के प्रति प्रतिबद्धता रही है। देश के आदिवासियों का कांग्रेस के साथ गहरा और मजबूत रिश्ता है। कांग्रेस पार्टी और उसके नेतृत्व ने इस बात को स्वीकार किया है कि आदिवासी और वन निवासी हमारे देश के पर्यावरण की धरोहर के रक्षक हैं। कांग्रेस वनों में रहने वाले इन आदिवासियों और वन निवासियों के जीविका उपार्जन की जरूरतों को लेकर हमेशा जागरूक रही है। कांग्रेस की यह मान्यता रही है कि वनों की सुरक्षा की जिम्मेदारी केवल वन विभाग के सरकारी कर्मचारियों पर छोड़ कर निश्चित नहीं रहा जा सकता। कांग्रेस का यह गहरा विश्वास रहा है कि वनों को सुरक्षित रखने के लिये सभी भागीदारों का योगदान आवश्यक है।

 

आदिवासियों के प्रति कांग्रेस की प्रतिबद्धता राष्ट्रीय न्यूनतम साझा कार्यक्रम के इन तीन बिन्दुओं से स्पष्ट होती हैः

 

  • संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार राज्यों से कानून बनाने का आग्रह करेगी ताकि वनों में काम करने वाले कमजोर वर्ग के सभी लोगों को तेंदूपत्ता सहित लघु वनोपज संबंधी मालिकाना हक प्रदान किया जा सके।

  • संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार आर्थिक प्रगति तथा पर्यावरण संरक्षण के लक्ष्यों में सामंजस्य बैठाने के सभी प्रयास करेगी, विशेषकर उन मामलों में जहां पर आदिवासी समुदाय वनों पर निर्भर हैं।

  • आदिवासी समुदायों तथा अन्य वन निवासी समुदायों का वन्य क्षेत्रों से निष्कासन बंद कर दिया जायेगा। वनों की सुरक्षा तथा सामाजिक वनीकरण शुरू करने के लिये इन समुदायों का सहयोग लिया जायेगा। खनिज संसाधनों तथा जल स्रोतों आदि पर इन आदिवासी समुदायों को कानून द्वारा निर्धारित अधिकारों की पूरी तरह सुरक्षा की जायेगी।

 

अपनी इस प्रतिबद्धता को अमली जामा पहनाने के लिये संप्रग सरकार ने पहले अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की पहचान) कानून 2006 को पारित किया और इसके पश्चात्‌ 31 दिसंबर, 2007 को इसके अंतर्गत नियमों की अधिसूचना जारी कर दी। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इस कानून का स्वागत किया गया है और इस बात की मांग की गयी है कि इस कानून को पूरी दुनिया में स्थानीय लोगों के लिये एक आदर्श कानून मानकर लागू किया जाना चाहिये। इस कानून से दो प्रमुख बातें स्पष्ट हो जाती है :

 

1.         इस कानून ने आदिवासियों को सम्मान से जीने के मौलिक अधिकार को मान्यता प्रदान की है।

2.         इस कानून ने इस बात को स्वीकार किया है कि आदिवासी, वनों और वन्य प्राणियों के संरक्षक हैं। अब इस बात का सबूत वैज्ञानिक आधार पर प्राप्त है कि आदिवासी ही वनों के रक्षक हैं।

 

संसद द्वारा इस कानून को पारित करने के बाद तथा सरकार द्वारा इसके अंतर्गत नियमों की अधिसूचना जारी हो जाने के पश्चात्‌ अब ये कांग्रेस कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारी है कि देश में 3,000 वन्य ग्रामों में रहने वाले आदिवासी और वन निवासी अपने कानूनी हकों को प्राप्त कर सकें और देश की विकास प्रक्रिया में पूरी तरह भागीदार बन सकें। अपनी तरफ से सरकार ने इस बात का प्रयास किया है कि पूरी प्रक्रिया सरल और स्पष्ट हो, पर इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिये कि प्रत्येक मामले में बड़ी सावधानी और संवेदनशीलता के साथ व्यवहार किया जाये जिससे कि यह सुनिश्चित किया जा सके कि जो आदिवासी पीढ़ी दर पीढ़ी वनों की सुरक्षा कर रहे हैं उन्हें अपना हक मिल सके।

 

इस कानून के प्रमुख बिन्दु

 

  • जो आदिवासी और अन्य परंपरागत वन निवासी पीढ़ियों से वनों में रह रहे हैं उनके अधिकारों को मान्यता प्रदान की गयी है और अब दस्तावेजों में इन्हें दजर् किया जायेगा।

  • वन अधिकारों की मान्यता प्रदान करने तथा अधिकार प्रदान करने के लिये निर्धारित तिथि 13 दिसंबर, 2005 है।

  • उन सभी आदिवासियों और अन्य परंपरागत वन निवासियों को जो इस तिथि के पूर्व तीन पीढ़ियों से वनों में रह रहे हैं तथा अपनी आजीविका के लिये वनों और वन भूमि पर निर्भर रहते हैं, मान्यता प्रदान की जायेगी।

  • वनभूमि पर कब्जा रखने की अधिकतम सीमा हेक्टेयर प्रति परिवार होगी।

  • ग्राम की सीमा के भीतर या बाहर लघु वनोपज के संग्रह, इस्तेमाल और बिक्री के स्वामित्व और पहुंच के अधिकार को भी मान्यता प्रदान की गयी। लघु वनोपज की परिभाषा में इमारती लकड़ी को छोड़कर वो सभी वन उत्पाद शामिल हैं जिनकी उत्पत्ति पौधों से होती है। इसमें बांस, ब्रश की लकड़ी, अंगूर, बैट, टसर, कोया, शहद, मोम, लाख, तेंदू पत्ते, औषधीय पौधे, जड़ी बूटियां, जड़ें, टुबेर तथा अन्य ऐसे उत्पादन शामिल हैं।

  • जिन मामलों में अनुसूचित जनजातियों और परंपरागत वन निवासियों को 13.12.2005 के पूर्व किसी भी प्रकार से वन भूमि से कानूनी अधिकार प्रदान किये बिना गैर कानूनी ढंग से हटाया गया है उनके स्वस्थान पर पुनर्वास के अधिकार को मान्यता प्रदान की गयी है। इन मामलों में वैकल्पिक भूमि देने का भी प्रावधान है।

  • जो अधिकार प्रदान किये गये हैं वो वंशागत हैं लेकिन वो अन्य संक्रामय या हस्तांतरणीय नहीं है।

  • यह भी प्रावधान है कि किसी भी आदिवासी या परंपरागत निवासी को अधिकारों के प्राप्त होने की प्रक्रिया के पूरे होने के पूर्व उसके कब्जे की वन भूमि से निष्कासित या बेदखल नहीं किया जायेगा।

  • ग्राम पंचायत को यह अधिकार प्राप्त है कि वो दावे आमंत्रित करके व्यक्तिगत और सामूहिक वन अधिकारों और उनकी सीमाओं का निर्धारण करें।


इस
कानून और उसके नियमों के अंतर्गत दो फॉर्म हैं :

 

फार्म-ए (प्ररूप-'क') वन भूमि पर अधिकार के दावे के लिये

फार्म-बी (प्ररूप-'ख') सामूहिक अधिकारों के दावे के लिये


 
 

 

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